बिक्रमजीत सिंह
ऋषिकेश, सांसार वाणी जुलाई। आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा से श्रावण कृष्ण पंचमी तक आयोजित षड्िदवसीय संगीतमय श्रीरामचरितमानस अखंड पाठ का समापन एक भव्य व भावमय संत भंडारे के साथ संपन्न हुआ। यह पावन आयोजन परम पूज्य अनन्त विभूषित श्रीमत्परमहंस श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महामण्डलेश्वर स्वामी शुकदेवानन्द सरस्वती महाराज के 60वें महानिर्वाण महोत्सव के अवसर पर आयोजित किया गया।पूज्य स्वामी शुकदेवानन्द सरस्वती जी महाराज महाज्ञानी संत महापुरूष थे, वे सनातन धर्म की दिव्य परंपरा के एक अद्भुत स्तंभ थे। उनका संपूर्ण जीवन भारतीय संस्कृति, वेद-वेदान्त और भगवद्भक्ति को समर्पित रहा। आज भी उनकी शिक्षाएं और आशीर्वाद श्रद्धालुओं के जीवन को आलोकित कर रहे हैं।उनका संदेश जल में नाव रहे तो कोई हानि नहीं, पर नाव में जल नहीं रहना चाहिये, इसी प्रकार साधक संसार में रहे तो कोई हानि नहीं, परन्तु साधक के भीतर संसार नहीं रचना चाहिये।श्रीरामचरितमानस के इस सामूहिक अखंड पाठ में बड़ी संख्या में संत, विद्वान और श्रद्धालु एकत्र हुए।


संगीतमय पाठ की सुमधुर ध्वनि से पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से युक्त कर दिया। श्रीरामचरितमानस एक महाग्रंथ है जो भारतीय जनमानस की आत्मा है। उसमें भक्ति है, नीति है, नीति में जीवन-दर्शन और जीवन में लोककल्याण का संदेश भी समाहित है।स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि श्रीरामचरितमानस, संस्कारों का अमृत है। श्रीरामचरितमानस का पाठ एक दिव्य संस्कार है। मानस हमें मर्यादा, सेवा, प्रेम, त्याग, और संपूर्ण जीवन की शुचिता का संदेश देती है। महानिर्वाण महोत्सव न केवल एक पुण्यस्मरण है, बल्कि उस दिव्य ज्योति को प्रणाम करने का अवसर है, जिन्होंने अनगिनत आत्माओं को आत्मज्ञान और शांति की दिशा दिखाई। इस अवसर पर भव्य संत भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें सैकड़ों श्रद्धालुओं ने संतों की सेवा कर पुण्य लाभ अर्जित किया। यह भंडारा अन्न सेवा की उस परंपरा का स्मरण था जिसमें अतिथि और संत को नारायण के रूप में सेवा देने की भावना रही है।श्री रामचरितमानस के माध्यम से युवा पीढ़ी में जीवन मूल्य संप्रेषित होते हैं। जब समाज दिशाहीन हो रहा हो, तब श्रीराम जी के आदर्श और मानस का प्रकाश एक अमिट मार्गदर्शक है।श्रीरामचरितमानस का यह भव्य अखंड पाठ और संत भंडारा एक ऐसा पुण्य अवसर बना, जिसमें श्रद्धा, सेवा, भक्ति और आत्मचिंतन की सरिता एक साथ बही। इस आयोजन के माध्यम से पूज्य शुकदेवानन्द जी महाराज को श्रद्धांजलि दी और उनके आदर्शों को अपनाने और सनातन धर्म की महिमा ये जीवन को प्रकाशित करने का संकल्प लिया।इस पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन के व्यवस्थापक आर ए तिवारी जी, हीरालाल जी, आर के दीक्षित जी और परमार्थ निकेतन के ऋषिकुमार उपस्थित रहे।